तीजा पर्व पर मायके पहुंचीं बेटियां, सुहाग की मंगलकामना के लिए रखा निर्जला व्रत
कड़ू भात से शुरू हुई परंपरा, सूर्योदय के बाद पूजा-अर्चना के साथ व्रत होगा पूर्ण; नगर से गांव तक दिखा तीजा का उल्लास

डौंडी लोहारा। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक एवं प्रमुख तीज-त्योहारों में शामिल तीजा पर्व इस वर्ष भी नगर सहित ग्रामीण अंचलों में हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। तीजा पर्व महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस अवसर पर विवाहित बेटियां अपने मायके पहुंचकर पति एवं परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं।
छत्तीसगढ़ में तीजा पर्व की शुरुआत से ही एक विशेष पारिवारिक परंपरा जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार तीजा के एक दिन पहले बेटियों को उनके ससुराल से मायके लाया जाता है। मायके पहुंचने के बाद रात्रि में उन्हें पारंपरिक रूप से कड़ू भात खिलाया जाता है। कड़ू भात में मुख्य रूप से करेले की सब्जी के साथ दाल-चावल शामिल होते हैं। इसके बाद महिलाएं व्रत का संकल्प लेकर तीजा का निर्जला उपवास प्रारंभ करती हैं।
मायके आने की परंपरा आज भी कायम
तीजा पर्व की सबसे भावनात्मक परंपराओं में बेटियों का मायके आना शामिल है। जिन बेटियों के लिए मायके में रुकना संभव होता है, वे वहीं रहकर तीजा का व्रत करती हैं। वहीं पारिवारिक एवं ससुराल की जिम्मेदारियों के कारण कुछ बेटियां कड़ू भात खाने के बाद वापस ससुराल लौट जाती हैं और तीजा के दिन पुनः मायके पहुंचकर पर्व मनाती हैं।
इस परंपरा के चलते तीजा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि मायके और बेटियों के बीच भावनात्मक रिश्ते को मजबूत करने वाला पर्व भी माना जाता है। तीजा के अवसर पर घरों में बेटियों के पहुंचने से उत्सव का माहौल बन जाता है।
निर्जला व्रत और पूजा-अर्चना
तीजा पर्व के दौरान महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अखंड सौभाग्य तथा परिवार की सुख-शांति की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। परंपरा के अनुसार तीजा के दिन विभिन्न अवसरों पर पूजा-अर्चना की जाती है। महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव का स्मरण करते हुए विधि-विधान से पूजा करती हैं।
मान्यता है कि यह व्रत माता पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए की गई कठोर तपस्या से जुड़ा हुआ है। व्रत की पूर्णता अगले दिन सूर्योदय के बाद पूजा-अर्चना के उपरांत होती है। इसके बाद महिलाएं अपना उपवास तोड़ती हैं।
कड़ू भात के पीछे धार्मिक परंपरा के साथ स्वास्थ्य संबंधी मान्यता
तीजा पर्व से जुड़ी लोकपरंपराओं में व्रत से एक दिन पहले कड़ू भात खाने का विशेष महत्व बताया जाता है। लोकमान्यता में करेले तथा अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थों को अगले दिन के निर्जला व्रत के लिए उपयोगी माना जाता है। हालांकि, 24 घंटे तक प्यास न लगने या शरीर में पानी एवं ग्लूकोज को निश्चित रूप से संतुलित रखने जैसे दावों को वैज्ञानिक रूप से सार्वभौमिक तथ्य नहीं माना जा सकता। निर्जला व्रत स्वास्थ्य की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण हो सकता है, इसलिए विशेषकर गर्भवती, बुजुर्ग या किसी बीमारी से पीड़ित महिलाओं को चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखना चाहिए।
माता पार्वती और हरतालिका से जुड़ी धार्मिक मान्यता
हरतालिका तीज के संबंध में धार्मिक कथा भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। इस तपस्या के दौरान उनकी सखी हरतालिका भी उनके साथ रही और उन्होंने भी व्रत एवं तपस्या में उनका साथ दिया।
कथा के अनुसार माता पार्वती की तपस्या सफल होने पर भगवान शिव उन्हें पति रूप में प्राप्त हुए। इसके बाद माता पार्वती ने अपनी सखी हरतालिका को वर मांगने के लिए कहा। हरतालिका ने प्रार्थना की कि जिस प्रकार माता पार्वती को भगवान शिव जैसे वर प्राप्त हुए, उसी प्रकार इस व्रत को करने वाली कन्याओं को भी मनचाहा एवं योग्य वर प्राप्त हो तथा विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिले।
इसी धार्मिक मान्यता के चलते तीजा पर्व को सौभाग्य, दांपत्य सुख और मनोवांछित जीवनसाथी की कामना का पर्व माना जाता है। विवाहित महिलाएं जहां पति की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
इस तरह तीजा पर्व छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, धार्मिक आस्था और पारिवारिक भावनाओं का सुंदर संगम है। मायके पहुंची बेटियों के स्वागत से लेकर कड़ू भात की परंपरा, निर्जला उपवास और भगवान शिव-माता पार्वती की पूजा तक, पर्व की प्रत्येक परंपरा में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है।




