Wednesday, June 10, 2026

लकड़ी माफियाओं के निशाने पर हरियाली:- चेनसा मशीनों से प्रतिदिन कट रहे हजारों हरे वृक्ष, पर्यावरण प्रेमियों में जनसेवक धर्मेंद्र निषाद ने उठाए गंभीर सवाल

 

लकड़ी माफियाओं के निशाने पर हरियाली:- चेनसा मशीनों से प्रतिदिन कट रहे हजारों हरे वृक्ष, पर्यावरण प्रेमियों में जनसेवक धर्मेंद्र निषाद ने उठाए गंभीर सवाल

 

*बालोद* :- जिले में हरे-भरे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण की बात करने वाले समाजसेवियों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि लक्खा मशीन (चेनसा) के बढ़ते उपयोग के बाद से खेत-खलिहानों, मेड़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में हरे वृक्षों की कटाई हो रही है।

स्थिति यह है कि कभी किसानों को छाया और पर्यावरणीय संतुलन प्रदान करने वाले बबूल, बेर, कहुआ, कशही सहित अनेक स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं।


पर्यावरण रक्षक धर्मेंद्र निषाद ने इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पूर्वजों द्वारा लगाए गए ये वृक्ष केवल लकड़ी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर हैं। इन्हीं वृक्षों की छांव में किसान वर्षों तक विश्राम करते रहे, पशुओं को आश्रय मिलता रहा और पर्यावरण संतुलित बना रहा। लेकिन आज चंद रुपयों के लालच में इन्हें तेजी से काटा जा रहा है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इतनी बड़ी मात्रा में हो रही वृक्ष कटाई के लिए राजस्व विभाग अथवा संबंधित विभागों से विधिवत अनुमति ली जा रही है? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक निगरानी पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। वहीं यदि अनुमति दी जा रही है, तो उसके पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन कितना किया जा रहा है, यह भी चिंतन का विषय है।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि वृक्षारोपण, पर्यावरण बचाओ अभियान, रैलियां और पोस्टर तभी सार्थक होंगे जब मौजूदा वृक्षों को बचाने के लिए भी प्रभावी कदम उठाए जाएं। जिले में पिछले कुछ वर्षों में जितने वृक्ष कटे हैं, उतने संभवतः पिछले कई दशकों में भी नहीं कटे होंगे। ऐसे में प्रशासन, वन विभाग और राजस्व विभाग की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
जानकारों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी के बिचौलिए किसानों से औने-पौने दामों में वृक्ष खरीद लेते हैं। कई बार किसानों को वृक्षों के वास्तविक पर्यावरणीय और आर्थिक महत्व की जानकारी भी नहीं होती। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनजागरूकता अभियान चलाकर किसानों को वृक्ष संरक्षण के प्रति प्रेरित करे।
धर्मेंद्र निषाद ने कहा कि सरकार की आंख और कान प्रशासनिक व्यवस्थाएं होती हैं, फिर भी यदि कुछ गिने-चुने लकड़ी कारोबारियों के सामने व्यवस्था बेबस नजर आती है तो यह चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन किसी एक व्यक्ति की जागीर नहीं, बल्कि समस्त मानव समाज और जीव-जंतुओं की साझा धरोहर हैं। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा।
उन्होंने जिलेवासियों से अपील करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व भी है। यदि आज हम वृक्षों को बचाने के लिए संगठित प्रयास नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। सामूहिक प्रयासों से ही हरियाली बचाई जा सकती है और एक बेहतर भविष्य का निर्माण संभव है।

— धर्मेंद्र निषाद, पर्यावरण रक्षक, डोंडी लोहारा

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