जिला चिकित्सालय में अधिकारियों की मनमानी, सलाहकार फरमा रहे आराम, रिफर सेंटर बना जिला अस्पताल

बालोद :- बालोद जिले का एकमात्र 100 बिस्तर वाला जिला अस्पताल इन दोनों जिला अस्पताल के अधिकारी कर्मचारियों की मनमानी का शिकार है। अधिकारी कर्मचारियों की इसी मनमानी के कारण मरीज इधर-उधर भटकने पर मजबूर है। मरीज को ना बेहतर इलाज मिल पा रहा है ना ही बेहतर सुविधा। जिसके चलते गरीब तबके के लोगों को मजबूरन निजी अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है।
अस्पताल में बाबू गिरी हावी
दरअसल जिला अस्पताल में कार्यरत चुनिंदा बाबूओं का खूब बोलबाला है। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉक्टर श्रीमाली ने उन्हें खुला छूट दे रखा है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से बाबूओं की ही तूती बोल रही है और डॉक्टर श्रीमाली का यह रवैया मरीजों के लिए समस्या पैदा कर रहा है।
अस्पताल सलाहकार की काम चोरी
जिला अस्पताल में पदस्थ सलाहकार डॉक्टर कल्याण सिंह के काम चोरी की भी लगातार का थे मिल रही है। अस्पताल की तमाम व्यवस्था और कर्मचारियों ड्यूटी लगाने की जिम्मेदारी लगाने की इसी पर होती है। जिसे बाकायदा हर वार्ड में घूमघूमकर व्यवस्थाओं का जायजा लेना होता है और ड्यूटी लगे कर्मचारियों द्वारा ड्यूटी किए जाने की भी मोनिटरिंग किया जाना होता है। लेकिन सुबह 7 बजे पहुंचने के बजाय वह बड़े आराम से 10 बजे के बाद अस्पताल पहुंचते हैं और वार्डों में घूमने के बजाय एक कमरे में एसी की हवा खाते बैठे रहते हैं।
मरीज हलाकान, डॉक्टर मस्त
बालोद जिला अस्पताल में ओपीडी का समय सुबह 9 बजे से दोपहर 1 बजे तक निर्धारित है और शाम 4 बजे से 5 पांच बजे तक है। लेकिन जिला अस्पताल में पदस्थ अधिकांश डॉक्टर समय से पहले सांस की ड्यूटी से रवानगी लेते हैं और निजी अस्पतालों में जाकर मरीजों का इलाज करते हैं।
डॉक्टर पर लगाम नहीं
जिला अस्पताल में सिविल सर्जन ही वहां का मुखिया होता है ऐसे में ना हीं उनके द्वारा डॉक्टर पर लगाम लगाई जा रही है और ना हीं वहां काम करने वाले कर्मचारियों पर। जिसके कारण से वहां काम करने वाले डॉक्टर और मरीज में बेलगाम हो गए हैं। यही वजह है सिविल सर्जन के सुस्त रवैया से अक्सर मरीजों के साथ अस्पताल के स्टाफ द्वारा दुर्व्यवहार की शिकायत आती है।
निजी अस्पतालों में सांठगांठ
राज्य सरकार की ओर से जिला अस्पताल में बेहतर इलाज के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान की है। ताकि गरीब व मजदूर वर्ग के लोगों को मुफ्त में बेहतर इलाज मिल सके। लेकिन पैसे की लालच में कई डॉक्टर निजी अस्पतालों से सांठगांठ कर कमीशन के चक्कर में मरीज को निजी अस्पताल भेज देते हैं। जिसके चलते गरीब मजदूर तबके के लोग कर्ज कर इलाज करवाने पर मजबूर है।




