नगर पालिका परिषद बालोद पर पारदर्शिता को लेकर सवाल : — सूचना के अधिकार न देने पर राज्य सूचना आयोग में पहुँचा मामला
इस मामले पर आवेदक उमेश सेन पूर्व बजरंग दल जिला संयोजक ने कही बड़ी बात

बालोद, :- बालोद नगर पालिका परिषद पर अब एक और गंभीर मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुँच गया है।

जन सूचना अधिकारी और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 का उल्लंघन करते हुए मांगी गई जानकारी न देने पर उमेश कुमार सेन, निवासी वार्ड क्रमांक 7, काशी बाना तालाब, पांडे पारा, बालोद द्वारा द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग, छत्तीसगढ़ में दायर की गई है।
यह मामला शीतला मंदिर गंगासागर तालाब, बालोद के सौंदर्यीकरण, रख-रखाव, टेंडर प्रक्रिया, व्यय विवरण और DPR (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) से संबंधित है।
सबसे बड़ा सवाल पूछ रही है जनता
जानकारी 1995 से 2025 26 तक की मांगी गई थी
उद्देश्य यह था की 30सालों में एक तालाब के पीछे कितना रकम खर्च किया गया है और इसका लाभ क्या हुआ।
यह पूरा विषय नगर पालिका परिषद बालोद के प्रशासनिक और वित्तीय कार्यों की पारदर्शिता से सीधा जुड़ा हुआ है।
⚖️ कानूनी पृष्ठभूमि और गंभीर उल्लंघन
उमेश कुमार सेन द्वारा 21 नवंबर 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(1) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया गया था। निर्धारित 30 दिनों में सूचना उपलब्ध न कराए जाने पर 26 दिसंबर 2025 को प्रथम अपील दायर की गई।
प्रथम अपील की सुनवाई 23 जनवरी 2026 को हुई, जिसमें अपीलकर्ता तो उपस्थित रहे परंतु अपीलीय प्राधिकारी अनुपस्थित रहे और कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया। केवल मौखिक रूप से यह कहकर मामला टाल दिया गया कि “जानकारियाँ अलग-अलग विषयों की हैं।”
परंतु अपीलकर्ता ने स्पष्ट किया है कि मांगी गई सभी जानकारियाँ एक ही परियोजना (गंगासागर तालाब सौंदर्यीकरण) से संबंधित हैं। यह कहना कि ये अलग-अलग विषय हैं, RTI अधिनियम की धारा 6(1) की भावना के विपरीत है और सूचना से बचने का प्रयास है।
🧾 अपील में लगाए गए प्रमुख आरोप
जन सूचना अधिकारी द्वारा 30 दिनों में उत्तर न देना — धारा 7(1) का उल्लंघन।
प्रथम अपीलीय प्राधिकारी द्वारा सुनवाई में अनुपस्थिति — धारा 19(6) का उल्लंघन।
जानकारी जानबूझकर रोके जाने का आरोप — धारा 20(1) के अंतर्गत दंडनीय अपराध।
अपीलीय प्राधिकारी की लापरवाही — धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई योग्य।
🗣️ अपीलकर्ता का कहना
अपीलकर्ता उमेश कुमार सेन ने कहा —“नगर पालिका परिषद बालोद द्वारा लगातार सूचना से बचने का प्रयास किया जा रहा है। जब जानकारी एक ही परियोजना से जुड़ी है, तब उसे अलग-अलग आवेदन बताना कानून की अवहेलना है। यह केवल सूचना से बचने का तरीका है। मैं गरीब वर्ग (BPL) से संबंधित हूँ, फिर भी निःशुल्क सूचना न देकर मेरे अधिकारों का हनन किया गया है। यह पारदर्शिता और जनहित के खिलाफ है।”
📑 राज्य सूचना आयोग से अपील
अपील में यह मांग की गई है कि—
जन सूचना अधिकारी को निर्देशित किया जाए कि 15 दिवस में पूर्ण सूचना उपलब्ध कराएं।
धारा 20(1) के तहत ₹25,000 तक का दंड लगाया जाए।
अपीलीय प्राधिकारी की लापरवाही पर धारा 20(2) के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए।
आयोग स्वयं रिकॉर्ड निरीक्षण (Record Inspection) का आदेश दे।
भविष्य में ऐसे मामलों में नागरिकों को भटकाने से रोकने हेतु विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
🧩 जनहित का मामला
यह मामला केवल एक तालाब या मंदिर परिसर तक सीमित नहीं है। यह सवाल उठाता है कि नगर पालिका परिषद बालोद जैसे संस्थान जनता के पैसों से किए गए निर्माण कार्यों की पारदर्शिता और जिम्मेदारी कितनी निभा रहे हैं।
सूचना अधिकार अधिनियम का उद्देश्य जनता को “जानने का अधिकार” देना है, और जब वही रोका जाए तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है।
📰 समाज में संदेश
इस प्रकरण से यह संदेश जाता है कि अगर नागरिक सजग रहें और कानून का सहारा लें, तो प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है।
उमेश कुमार सेन जैसे नागरिकों के प्रयासों से आने वाले समय में बालोद जिला प्रशासन के विभिन्न विभागों — नगर पालिका, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग और वन विभाग — में भी पारदर्शिता की नई परंपरा स्थापित होगी।




